सत्य घटना: भटकती आत्मा ने की मुक्ति की गुहार और फिर
गद्गुरु
श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी ठाकुर 'प्रभुपाद' के एक शिष्य थे
श्रील भक्ति गौरव वैखानस महाराज। ये घटना उस समय की है जब पूज्यपाद वैखानस
महाराज जी का संन्यास नहीं हुआ था। आप ओड़ीसा के राजगुरु थे। एक बार आप किसी
गांव से गुज़र रहे थे। अंधेरा होने पर आपने पान की दुकान वाले से पूछा,
'मैं एक रात आपके गांव में ठहरना चाहता हूं । क्या आप उसकी व्यवस्था कर
सकते हैं? या मुझे बताएं की किसके घर जाने से यह व्यवस्था हो सकती है? '
पान वाले को न जाने क्या सूझी और उसने कहा, 'हां, हां क्यों नहीं ! हमारे
गांव में एक मकान खाली पड़ा है। हम पूरी हवेली आपको दे देतेहैं। आप वहां पर
विश्राम करें। आप थोड़ी देर यहां प्रतीक्षा करें, मैं उसकी सफाई, इत्यादि की
व्यवस्था करवाता हूं। कुछ समय प्रतीक्षा के बाद पूज्यपाद वैखानस महाराज जी
को वहां ले जाया गया और एक कमरे में उनके रहने की व्यवस्था की गई। एकादशी
का दिन था और महाराज जी का नियम था कि आप एकादशी को सारी रात माला किया
करते थे। महाराज जी उस हवेली में हरे कृष्ण महामन्त्र का जप कर रहे थे कि
आधी रात में कमरे में कुछ डरावनी सी आवाजे आने लगीं। महाराज जी स्थिति को
समझ गए । चूंकि आपने श्मशान घाट में अमावस्या की रात को भूत सिद्धि की हुई
थी, इसलिए आप जरा भी नहीं घबराए। गरजते हुए स्वर में आपने पूछा,' कौन हो
तुम? क्या चाहते हो?' आवाज आई,' मैं तुम्हें खा जाऊंगा।' महाराज जी ने कहा,
'मैं ब्राह्मण हूं। ब्रह्म-हत्या करने से डर नहीं लगता तुम्हें।' 'मुझे
क्या डर?' 'पहले जो तुमने पाप किए या आत्महत्या की उसके कारण तुम्हारी यह
गति हुई। अब ब्रह्म-हत्या करने से जानते हो क्या होगा मैं तुम्हारा कल्याण
कर सकता हूं।' अब आवाज में काफी नरमी थी। 'मैं इस घर की मालकिन थी । इसी
कमरे में मैंने आत्म-हत्या की थी। आत्म-हत्या करने के कारण मुझे यह
प्रेत-योनि प्राप्त हुई। मैं बहुत परेशान हूं। कर्मानुसार भूख लगती है पर
खा नहीं सकता, प्यास लगती है, पानी भी पी नहीं सकती।' महाराज जी ने पूछा,'
क्या करने से तुम्हारा कष्ट जाएगा?' 'एक एकादशी का फल भी अगर मुझे मिल जाए
तो मैं इस योनि से मुक्त हो जाऊंगा।' महाराज जी ने कहा, 'चिंता की कोई बात
नहीं। आज एकादशी है, मैं सारी रात हरिनाम करूंगा । तुम हरिनाम सुनो। '
प्रातः काल होने पर महाराज जी ने दाहिने हाथ की हथेली में जल लिया और
संकल्प मंत्र पढ़कर एकादशी का फल उस घर की मालकिन के निमित्त प्रदान कर
दिया। सारे दिन की थकान, पूरी रात हरिनाम करने के बाद महाराज जी विश्राम
करने लगे। इधर गांव में प्रातः काल जब ये चर्चा लोगों को पता लगी की पान
वाले ने किसी महात्मा को भूत हवेली में ठहरा दिया है तो सारे चितिंत हो गए ।
सभी को यह विश्वास था कि पहले की तरह भूत ने इस महात्मा को भी मार दिया
होगा और पान वाले को भला-बुरा कहने लगे। साथ ही लोगों को यह भी डर था कि वे
राजगुरु हैं, उन्हें कुछ होने से राजा हमें दण्ड देंगे । बहुत सी बातचीत
के बाद ये निर्णय लिया गया कि पहले हवेली में जाया जाय और देखा जाए। यदि
कोई अशुभ घटना घटी है तो हम पान वाले को आगे करके क्षमा मांगते हुए राजा को
सारी बात बता देंगे। दरवाज़ा खटखटाया गया। अंदर से कोई आवाज न आती देख, सभी
अनहोनी घटना को सोच कर घबरा गए परंतु लगातार दरवाजा खटखटाने से अंदर से
उच्च स्वर में हरिनाम की आवाज़ आई और महात्मा जी ने दरवाजा खोला। महात्मा जी
को जीवित देख कर सभी की जान में जान आई। उन्होंने राजगुरु जी को पूछा, 'आप
ठीक ठाक हैं? रात को कोई असुविधा तो नहीं हुई ?' राजगुरु ने कहा, ' नहीं !
कोई असुविधा नहीं। इस घर की मालकिन बहुत परेशान थी, मैंने एकादशी का
संकल्प करके उसे पिशाच जन्म से मुक्ति दिला दी है।' सभी राजगुरु से पिशाच
के उद्धार की बात सुन कर हैरान हो गए और श्रद्धा से उन्हें प्रणाम करने
लगे।

0 comments:
Post a Comment