इंडोनेशिया का विचित्र रिवाज: पेड़ के तने में करते हैं बच्चों के ‘मृत शव’ को दफ़्न
मृत्यु
जीवन-मरण एक कड़वा सच है, मनुष्य हो या जानवर, जन्म लेने वाला एक ना एक दिन
मृत्यु को प्राप्त होगा ही। यहां कोई अमर नहीं, यदि कुछ अजर-अमर है तो वह
है आत्मा। खैर यह तो हिन्दू मान्यताएं हैं, किंतु साइंस की खोज इससे काफी
अलग है। जन्म लेने और मृत्यु हो जाने के विभिन्न धर्मों में अलग-अलग तर्क
हैं, इसी तरह से जन्म एवं मरण के रिवाज़ भी भिन्न हैं।
समानता
लेकिन एक बात जो एक समान है वह है जन्म के समय सभी को मिलने वाले एखुशी और
मृत्यु के समय मिलने वाला दुख। यह धर्म और रिवाज़ से परे है, क्योंकि यह
भावनाओं की बात है। आपने शायद जन्म और मृत्यु से जुड़े कई रिवाज़ों के बारे
में सुना होगा, देखा होगा और अनुभव किया होगा, लेकिइन इंडोनेशिया के जिस
रिवाज़ एक बारे में हम यहां बताने जा रहे हैं वह वाकई विचित्र है।
इंडोनेशिया का रिवाज़
शायद आम इंसान किसी की मृत्यु के समय निभाए जा रहे इस रिवाज़ की कप्लना भी
नहीं कर सकता, लेकिन इंडोनेशिया के ताना तरोजा इलाके के लोग इस रिवाज़ को
निभाते हैं। यह रिवाज़ बच्चों की मृत्यु से जुड़ा है, यह रिवाज़ काफी मार्मिक
है इसलिए भावनाओं को संभालते हुए ही आगे बढ़ें।
ताना तरोजा
इंडोनेशिया के ताना तरोजा इलाके में जब कभी किसी बच्चे की मृत्यु होती है
तो इलाके में शोक का माहौल तो जरूर होता है। लेकिन शायद इसके साथ ही यहां
के लोगों के मन में एक फक्र की भावना भी होती है, क्योंकि वह इस मौत को
ज़ाया नहीं जाने देते।
बच्चे की मृत्यु
क्योंकि बच्चे की मृत्यु के बाद ये लोग शव को पेड़ के तने में दफ़्ना देते
हैं। जी हां... ज़मीन में दफ़्नाना या जलाना या फिर किसी जलाशय में बहा
देना... ऐसा कोई भी रिवाज़ यहां मौजूद नहीं है। ये लोग बच्चे के मृत शव को
पेड़ एक तने में दफ़्ना देते हैं, ताकि वह प्राकृति की गोद में समा जाए।
अद्भुत रिवाज़
ताना तरोजा इलाके की यह सोच वाकई अद्भुत है, भवानाओं को साइंस की दुनिया से
जोड़कर फिर से उसे एक रूप देना, यह एक मिसाल है। यहां के लोगों का कहना है
कि यदि बच्चे के मृत शव को पेड़ के तने में मिला दिया जाए, तो कुछ समय के
पश्चात अपने आप ही वह शव धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से पेड़ के साथ मिलता
जाएगा।
प्राकृति में समाना
प्राकृति उसे अपने में समा लेगी, और अंत में यदि वहां कुछ बचेगा तो वह होगा
हरा-भरा सुंदर वृक्ष। इंडोनेशिया की राजधानी मकास्सर से करीब 186 मील दूर,
पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है ताना तरोजा जहां बच्चों के मृत शव को पेड़ एक
तने में दफ़्न कर दिया जाता है।
वृक्षों के तने में
यदि आप तस्वीरों को गौर से देखें तो आपको विशाल वृक्षों के तने में बड़े-बड़े
छिद्र दिखाई देंगे, जो यहां के लोगों द्वारा ही बनाए जाते हैं। इन छिद्रों
में बच्चों के मृत शरीर को दफ़्न किया जाता है और फिर बाद में पूरे
रीति-रिवाज़ के साथ उसे ढंक दिया जाता है।
बच्चे के मृत शव
पेड़ एक तने में डालने से पहले बच्चे के मृत शव को किसी कपड़े से लपेटा जाता
है। जिसके बाद ही उसे उस छिद्र में डाल दिया जाता अहि, जो गांव वालों
द्वारा ही पेड़ के तने में बनाया जाता है।
काफी छोटे बच्चों के लिए
लेकिन यह रिवाज़ सभी बच्चों के लिए नहीं है, केवल उन बच्चों के लिए जो काफी
छोटे थे। इतने छोटे कि अभी तक उनके दांत भी आना आरंभ नहीं हुए थे। केवल
इन्हीं नन्हे बच्चों के मृत शवों को पेड़ के तने में जगह दी जाती है।
यहां के लोगों का विश्वास
इसमें कोई दो राय नहीं है कि ताना तरोजा गांव के लोगों द्वारा निभाए जा रहे
इस रिवाज़ के अंतर्गत जिन बच्चों के शव को पेड़ के तने में डाला जाता है,
उन्हें प्राकृति के साथ मिलने में सालों साल लग जाते हैं। किंतु यही यहां
के लोगों का विश्वास है कि एक ना एक दिन यह शव प्राकृति की गोद में जरूर
जाएंगे।
अन्य विश्वास
इस रिवाज़ को यहां मानेन के नाम से जाना जाता है। एक और बात बता दें कि इस
रिवाज़ का सि गांव वालों के मन में एक और रूप और एक अन्य विश्वास भी है।
यहां के लोगों का मानना है कि मरने के बाद चाहे उनका बच्चा उनसे दूर हो गया
है, लेकिन फिर भी पास ही है।
बच्चे दूर नहीं जाते
गांव के ही पेड़ के तने में बच्चे के मृत शरीर को दफ़्न करने से उनके बच्चे
उनसे कभी दूर नहीं जाते। बल्कि पास ही रहते हैं, फिर चाहे एक दिन वह शव
खत्म क्यों ना हो जाए। लेकिन फिर भी प्राकृति के जरिए उनके बच्चे उनसे जुड़े
रहते हैं।

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