Thursday, March 3, 2016

इसलिए रखते हैं साधु माला, जटा, तिलक, भस्म और कमंडल इसलिए रखते हैं साधु माला, जटा, तिलक, भस्म और कमंडल

भारतीय हिंदू साधुओं का एक विशेष पहनावा होता है जो हर साधु का अपना अलग होता है। कुछ साधु केवल सिर पर भस्म लगाते हैं, कुछ कानों में कुंडल पहनते हैं, कुछ माला पहनते हैं और कुछ अघोरियों की तरह बिल्कुल नग्न और सभी चीजों से परहेज करने वाले होते हैं।
माला
साधु समाज में माला का भी विशेष महत्व है। वैष्णव संप्रदाय में अधिकांश जहां तुलसी की माला पहनते हैं वहीं शैव में रुद्राक्ष की माला का उपयोग होता है। उदासीन में बाध्यता नहीं है। अखाड़ा या उपसंप्रदाय परंपराओं के अनुसार इन मालाओं में भी भिन्नता होती है।
जटा
कई नागा साधु बड़ी जटा रखते हैं। मोटी-मोटी जटाओं की देखरेख भी काफी जतन से की जाती है। इनमें कोई रुद्राक्ष तो कोई फूलों की माला पहन इन्हें आकर्षक रूप भी देता है।
कमंडल, चिमटा और त्रिशूल
कुछ साधु-संत कमंडल तो कुछ त्रिशूल या चिमटा साथ रखते हैं। कुछ साधु धातु के तो कुछ लौकी (तुंबे) के कमंडल का उपयोग करते हैं। नागा साधुओं को योद्धा भी माना जाता है। कई साधु शस्त्र के रूप में तलवार, त्रिशूल, फरसा साथ रखते हैं।
तिलक
साधु-संतों में शृंगार का अपना महत्व है, विशेषकर तिलक का। वैष्णव संप्रदाय के साधु-संत खड़ा तिलक लगाते हैं। इसमें भी अखाड़ों व उप संप्रदाय के अनुसार आकृति या रंग में परिवर्तन होता है। वैष्णव संप्रदाय में कई प्रकार के तिलक होते हैं। शैव संप्रदाय में आड़ा तिलक लगाया जाता है। उदासीन में खड़ा-आड़ा दोनों ही प्रकार के तिलक लगाए जा सकते हैं। तिलक लगाने में साधु-संत विशेष एकाग्रता बरतते हैं। तिलक इतनी सफाई से लगाया जाता है कि अमूमन रोज ही उनका तिलक एक समान नजर आता है।
वस्त्र
वैष्णव संप्रदाय में ज्यादातर साधु-संत श्वेत, कसाय या पीतांबरी वस्त्र का उपयोग करते हैं, वहीं शैव संप्रदाय में भगवा रंग के वस्त्रों का अधिक उपयोग होता है। उदासीन में दोनों ही प्रकार के वस्त्रों का चलन है। साथ ही साधु-संत रत्नों से भी सुशोभित होते हैं।
भस्म
भगवान शिव भस्म रमाते हैं। अपने अराध्य की ही तरह शैव संप्रदाय के नागा साधुओं को भस्म रमाना अति प्रिय होता है। रोजाना स्नान के बाद ये अपने शरीर पर भस्म लगाते हैं। उदासीन में भी कई साधु भस्म रमाते हैं।

प्राणायाम से मिलती हैं आध्यात्मिक और मानसिक शक्तियां

प्राणायाम के जरिए जैसे ही प्राण को साधा जाता है। मन अपने आप सधने लगता है और फिर साधक अंतर्मुखी साधना की शुरुआत करता है।
प्राणायाम
हम जीवनभर बाहर की बातों में ही उलझे रहते हैं। सभी इंद्रियां अपने-अपने विषयों में दौड़ती रहती हैं। इसे ही भोग कहते हैं।� लेकिन योग साधना में इन सभी इंद्रियों के विषयों को व्यक्ति बाहर ही रोककर ध्यान की अवस्था में बैठकर स्वयं को शून्य में स्थिर कर लेता है।
प्राण को प्राणायाम के जरिए काबू में लाकर आने-जाने वाली सांस की गति को एक जैसा कर लेता है। इससे मन हमारे प्राण से शक्ति पाता है। प्राणायाम के जरिए जैसे ही प्राण को साधा जाता है। मन अपने आप सधने लगता है और फिर साधक अंतर्मुखी साधना की शुरुआत करता है।
विचार
मन का कोई अस्तित्व नहीं होता सिर्फ� विचार होते हैं और विचार मन से हमेशा अलग होते हैं। वे ऐसी वस्तु नहीं है, जो तुम्हारे स्वभाव के साथ एकाकार हों, वे आते हैं और चले जाते हैं..तुम बने रहते हो, तुम स्थिर होते हो। तुम ऐसे हो जैसे कि आसमान, यह कभी आता नहीं, जाता नहीं, यह हमेशा यहां है।
बादल आते हैं और जाते हैं, वे क्षणिक हैंं। तुम विचार को पकडऩे का प्रयास भी करो तो रोक नहीं सकते। उसे जाना ही होगा, उसका अपना जन्म और मृत्यु है। विचार तुम्हारे नहीं हैं, वे तुम्हारे नहीं होते हैं। वे आगंतुक की तरह आते हैं, लेकिन वे मेजबान नहीं हैं।
ईश्वर
ईश्वर शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं, लेकिन शब्द का साधारण अर्थ है नियंता। जो इस विश्व कल्पना का नियंत्रण करता है, वह ईश्वर है। दार्शनिक भाषा में \'ईश्वर\' शब्द का एक और अर्थ समझा जाता है। सब बंधनों से मुक्त पुरुष को दार्शनिक भाषा में ईश्वर कहा जाता है। छोटा-मोटा दार्शनिक मतभेद चाहे जो भी हो, पर साधक की दृष्टि से ईश्वर सगुण ब्रह्य या भगवान को छोड़कर कुछ भी नहीं हैं।

आज्ञाचक्र की मजबूती के लिए लगाएं मस्तक पर तिलक

सभी धर्मों में तिलक एक मांगलिक प्रतीक माना जाता हैं। किसी भी पूजा, यात्रा, सफलता प्राप्ति आदि मौकों पर तिलक लगाकर शगुन की मंगल इच्छा की जाती है। तिलक का प्रत्यक्ष रिश्ता मस्तिष्क से है। मस्तक पर तिलक लगाते ही तन-मन शुद्ध हो जाते हैं। यह मान्यता है कि मस्तक पर तिलक या बिन्दी लगाने से चित्त में नम्रता व एकाग्रता बढ़ती है और तनाव से मुक्ति मिलती है।
हमारी दोनों भौहों के मध्य आज्ञाचक्र स्थित होता है। यह एक ऐसा चेतना केंद्र है जहां से संपूर्ण ज्ञान चेतना और क्रियात्मक चेतना का संचालन होता है। आज्ञा चक्र ही दिव्य नेत्र या तृतीय चक्षु है, जिसकी तुलना टेलीविजन राडार, टेलीस्कोप की समन्यवय युक्त ताकत से की जा सकती है।
आज्ञाचक्र सुदृढ़ होता है तो सुख व शांति का एहसास होता है। ओज तथा तेज बढ़ता है। तिलक लगाते ही मस्तक में एक तरह ही शीतलता, तरावट एवं ठंडक की अनुभूति होती है। तिलक में शुद्ध चंदन, कुमकुम, हल्दी का प्रयोग करें जो मुख मंडल को तेजस्वी बनाता है।

इस छोटी सी बात ने बनाया नेपोलियन को महान, आपके लिए भी है खास

एक बार की बात है। फ्रांस के विद्वानों ने नागरिकों से लेख आमंत्रित किए। सर्वश्रेष्ठ लेख के लिए पुरस्कार की घोषणा की गई थी। एक लेख नेपोलियन बोनापार्ट ने भी भेजा था। नेपोलियन के लेख को ही सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया। कुछ समय बाद जब नेपोलियन सम्राट बन गए तब वे इस बात को लगभग भूल चुके थे।ने 
नेपोलियन का एक मंत्री था टेलीरांत। उसे इस बात की जानकारी कहीं से मिल गई कि सम्राट नेपोलियन एक लेख लिखा था जो पुरस्कृत हुआ था। तब उसने अपने एक विशेष व्यक्ति को भेजकर उस लेख की मूलप्रति मंगवा ली। एक दिन उसने उस मूलप्रति को सम्राट के सामने रखकर हंसते हुए पूछा, सम्राट इस लेख के लेखक को आप जानते हैं?
नेपोलियन उस लेख को देखकर कुछ सोचने लगे। उनकी मुद्रा देख टेलीरांत ने सोचा कि सम्राट खुश होंगे और उसे पुरस्कार देंगे। कुछ देर सोचने के उपरांत सम्राट नेपोलियन ने उस प्रति को अपने हाथ में लिया और उसे लेकर कमरे मे जल रही अंगीठी के पास गए। वह कुछ देर उसे देखते रहे और फिर अंगीठी में उस लेख को डाल दिया जो कि जल गया।
यह सब टेलीरांत की समझ में नहीं आया। उसने नेपोलियन से पूछा, सम्राट इस लेख को आपने क्यों जला दिया?
नेपोलियन का जवाब था, यह लेख मेरे एक समय की उपलब्धि थी, लेकिन आज के लिए इसका कोई महत्व नहीं है। इसलिए मैंने इस लेख को जला दिया। टेलीरांत समझ गया कि देशकाल की परिस्थिति में चिंतन को नया रूप देते रहना चाहिए। ऐसा न हो कि हम पुरानी प्रशंसाओं में ही डूबे रहें।

52 पीठों में एक है यह सिद्धपीठ मंदिर, होती थी अनहोनी घटनाएं

सिर पर मुकुट के समान खड़ा पहाड़, उसके नीचे बैठी शक्तिपीठ कंकालीन देवी रियासत काल से ही लोगों के बीच आस्था का केंद्र है। पौराणिक कथा के अनुसार इन्हीं देवी के नाम पर कांकेर का नामकरण हुआ। यहां नवरात्र में दूर-दूर से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं और मां के चरणों में शीश झुकाकर अपनी कामना की मन्नतें मांगते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां देवी के चरण में आने पर भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।
ये है पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष यज्ञ में भगवान शंकर का अपमान देखकर देवी सती को इतना ज्यादा आघात लगा कि उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। यज्ञ में हुए अपमान और सती के वियोग में शंकर भगवान शंकर विक्षिप्त हो गए और सती के शरीर को लेकर पागलों की तरह पृथ्वी पर चक्कर काटने लगे। भगवान शंकर की यह दशा देखकर देवताओं को चिंता हुई और भगवान विष्णु से प्रार्थना करने लगे। इस पर विष्णु ने सुदर्शन चर्क से देवी सती के शरीर को खंड-खंड कर दिया और उनके अंग जहां-जहां गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ बना।
52 शक्ति पीठों में से एक
52 शक्ति पीठों में से एक कंकालीन पीठ के बारे में मान्यता है कि यहां पर सती का कंगन गिरा था। कंगन का अपभ्रंश कंकर हुआ और कंकर से ही इस नगर (प्राचीन में गांव) का नाम कांकेर पड़ा। सोमवंश के पतन के बाद चौदहवीं सदी में कंड्रा वंश के शासन काल में पद्मदेव के कार्यकाल में यहां मंदिर की स्थापना की गई।
मंदिर में प्रवेश करते ही बेहोश हो जाती थीं
ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर में पहले महिलाएं प्रवेश करते ही बेहोश हो जाती थीं या कुछ ना कुछ अनहोनी हो जाती थी। इस कारण यहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। 1990-91 में माता की विशेष पूजा-अर्चना की गई और उनसे विनती की गई। इसके बाद महिलाओं का प्रवेश कराया गया।
मंदिर परिसर में चट्टान पर लिखित लिपि रहस्यपूर्ण है। ऐसी मान्यता है कि जो इस लिपि को पढ़ लेगा, उसे खजाने की प्राप्ति होगी। इस लिपि को आज तक किसी के पढ़े जाने का प्रमाण नहीं है। इस लिपि में 84 लाख जीव-जंतुओं के भोजन के खर्च का ब्यौरा लिखा जाना बताया जाता है।
एक और कहानी प्रचलित
इस मंदिर का तार उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास स्थित कड़ा मानिकपुर के लोगों से भी जुड़ा है। कंकालीन मंदिर के पुजारी अभिषेक सोनी ने बताया कि उनके पूर्वज सुखदेव प्रसाद को राजा ने आभूषण बनाने के लिए यहां बुलाया था। कुछ दिनों के पश्चात मां कंकालीन देवी ने स्वप्न में कहा कि मैं जोगी गुफा पहाड़ के नीचे चट्टानों से ढ़की हूं। चट्टानों की खुदाई कराकर स्थापना करो। सुखदेव ने यह बात राजा को बताई।
राजा ने इसकी अनुमति नहीं दी और कहा कि मां ने हमको क्यों नहीं बताया लेकिन बार-बार सुखदेव को स्वप्न आते रहे। इस पर पुन: सुखदेव ने आग्रह किया तो राजा ने कहा कि यदि मूर्ति नहीं निकली तो 100 कोड़े लगाए जाएंगे। इस पर सुखदेव ने सहमति दे दी तो राजा ने खुदाई कराई और कंकालीन देवी व भैरो नाथ की मूर्तियां निकली, जिसकी राजा ने विधिवत स्थापना कराई और यह आज कंकालीन देवी के रूप में विख्यात है। आज भी सुखदेव के परिवार के लोग ही पूजा करते हैं और यहीं पर बस गए हैं। आज सुखदेव की पांचवी पीढ़ी के अभिषेक यहां पूजा-पाठ कर रहे हैं।

मुस्लिम महिला ने खोजा माता का मंदिर! करती है मां की पूजा

सियासत धर्म की आड़ में लोगों को तोड़ती है तो आस्था समाजों को जोड़ने में अहम भूमिका निभाती है, ऎसा ही कुछ हुआ है मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में, जहां एक मुस्लिम महिला में देवी के प्रति जागी आस्था ने मजहबी एकता की मिसाल पेश की है।
मंदसौर के श्यामगढ़ के माता मंदिर की पहचान हिंदुओं के मंदिर के तौर पर नहीं है। यहां आने वाला भक्त किसी धर्म का नहीं, बल्कि माता का भक्त होता है। इस मंदिर की खोज भी एक मुस्लिम महिला सुगना बी ने की है और उसी ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया है। इतना ही नहीं, वही मंदिर में नियमित तौर पर आरती भी करती है।
सुगना बी ने बताया कि उसे एक दिन सपना आया कि उसके घर के आसपास मंदिर है, उसने उसे महज सपना मानकर महत्व नहीं दिया। उसके कुछ दिन बाद फिर उसे ऎसे लगा, जैसे कोई देवी उससे मंदिर होने की बात कह रही हों।
वह बताती है कि उसने अन्य महिलाओं के साथ एक स्थान पर जाकर देखा तो वहां देवी की प्रतिमा दिखी। उसके बाद उसने लोगो से चंदा इकट्ठा कर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। वह मजदूरी कर अपने परिवार का भरण पोषण करती है। वह हर रोज काम पर जाने से पहले और लौटकर मंदिर जाना नहीं भूलती।
चैत्र नवरात्र में यह मंदिर माता की भक्ति के रंग में रंगा हुआ है, यहां पहुंचने वाले श्रद्घालुओं को कहना है कि धर्म कोई भी हो, वह सभी को मिलजुलकर रहने का संदेश देता है, माता के मंदिर के जीर्णोद्धार में सुगना बी ने अहम भूमिका निभाकर साबित कर दिया है कि आस्था किसी की किसी भी धर्म के प्रति हो सकती है।
एक तरफ जहां एक मुस्लिम महिला ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया है, वहीं आम लोगों के सहयोग से मंदिर के बाहर गरबा का भी आयोजन किया गया है। इसमें सभी धर्मो के लोग हिस्सा ले रहे हैं। यह मंदिर और गरबा का आयोजन कौमी एकता की मिसाल बन गया है।

Interesting News रोचक कहानी

एक अनोखा संबंध अवश्य पढे
इससे कोई फर्क नहीं पङता की आप विवाहित हैं या अविवाहित,
अगर पुरा पोस्ट पडेगे, तो प्रेम के आंसू छलक आयेंगे.........
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मुकदमा दो साल तक चला ...... आखिर पति-पत्नी में तलाक हो गया |
तलाक का कारण बहुत मामूली बातें थीं, इन मामूली बातों को बड़ी घटना में रिश्तेदारों ने बदला।
हुआ यों कि पति ने पत्नी को किसी बात पर तीन थप्पड़ जड़ दिए, पत्नी ने इसके जवाब में अपना सैंडिल पति की तरफ़ फेंका, सैंडिल का एक सिरा पति के सिर को छूता हुआ निकल गया।
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मामला रफा-दफा हो भी जाता, लेकिन पति ने इसे अपनी तौहिनी समझी, रिश्तेदारों ने मामला और पेचीदा बना दिया,
न सिर्फ़ पेचीदा बल्कि संगीन, सब रिश्तेदारों ने इसे खानदान की नाक कटना कहा, यह भी कहा कि पति को सैडिल मारने वाली औरत न वफादार होती है न पतिव्रता।
इसे घर में रखना, अपने शरीर में मियादी बुखार पालते रहने जैसा है।
कुछ रिश्तेदारों ने यह भी पश्चाताप जाहिर किया कि ऐसी औरतों का भ्रूण ही समाप्त कर देना चाहिए।
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बुरी बातें चक्रवृत्ति ब्याज की तरह बढ़ती है, सो दोनों तरफ खूब आरोप उछाले गए। ऐसा लगता था जैसे दोनों पक्षों के लोग आरोपों का वॉलीबॉल खेल रहे हैं। लड़के ने लड़की के बारे में और लड़की ने लड़के के बारे में कई असुविधाजनक बातें कही।
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मुकदमा दर्ज कराया गया।
पति ने पत्नी की चरित्रहीनता का तो पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया। छह साल तक शादीशुदा जीवन बीताने और एक बच्ची के माता-पिता होने के बाद आज दोनों में तलाक हो गया।
पति-पत्नी के हाथ में तलाक के काग़ज़ों की प्रति थी।
दोनों चुप थे, दोनों शांत, दोनों निर्विकार।
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मुकदमा दो साल तक चला था। दो साल से पत्नी अलग रह रही थी और पति अलग,
मुकदमे की सुनवाई पर दोनों को आना होता। दोनों एक दूसरे को देखते जैसे चकमक पत्थर आपस में रगड़ खा गए हों।
दोनों गुस्से में होते। दोनों में बदले की भावना का आवेश होता। दोनों के साथ रिश्तेदार होते जिनकी हमदर्दियों में ज़रा-ज़रा विस्फोटक पदार्थ भी छुपा होता।
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लेकिन कुछ महीने पहले जब पति-पत्नी कोर्ट में दाखिल होते तो एक-दूसरे को देख कर मुँह फेर लेते। जैसे जानबूझ कर एक-दूसरे की उपेक्षा कर रहे हों, वकील औऱ रिश्तेदार दोनों के साथ होते।
दोनों को अच्छा-खासा सबक सिखाया जाता कि उन्हें क्या कहना है। दोनों वही कहते। कई बार दोनों के वक्तव्य बदलने लगते। वो फिर सँभल जाते।
अंत में वही हुआ जो सब चाहते थे यानी तलाक ................
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पहले रिश्तेदारों की फौज साथ होती थी, आज थोड़े से रिश्तेदार साथ थे। दोनों तरफ के रिश्तेदार खुश थे, वकील खुश थे, माता-पिता भी खुश थे।
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तलाकशुदा पत्नी चुप थी और पति खामोश था।
यह महज़ इत्तेफाक ही था कि दोनों पक्षों के रिश्तेदार एक ही टी-स्टॉल पर बैठे , कोल्ड ड्रिंक्स लिया।
यह भी महज़ इत्तेफाक ही था कि तलाकशुदा पति-पत्नी एक ही मेज़ के आमने-सामने जा बैठे।
लकड़ी की बेंच और वो दोनों .......
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''कांग्रेच्यूलेशन .... आप जो चाहते थे वही हुआ ....'' स्त्री ने कहा।
''तुम्हें भी बधाई ..... तुमने भी तो तलाक दे कर जीत हासिल की ....'' पुरुष बोला।
''तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है????'' स्त्री ने पूछा।
''तुम बताओ?''
पुरुष के पूछने पर स्त्री ने जवाब नहीं दिया, वो चुपचाप बैठी रही, फिर बोली, ''तुमने मुझे चरित्रहीन कहा था....
अच्छा हुआ.... अब तुम्हारा चरित्रहीन स्त्री से पीछा छूटा।''
''वो मेरी गलती थी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था'' पुरुष बोला।
''मैंने बहुत मानसिक तनाव झेली है'', स्त्री की आवाज़ सपाट थी न दुःख, न गुस्सा।
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''जानता हूँ पुरुष इसी हथियार से स्त्री पर वार करता है, जो स्त्री के मन और आत्मा को लहू-लुहान कर देता है... तुम बहुत उज्ज्वल हो। मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी गंदी बात नहीं करनी चाहिए थी। मुझे बेहद अफ़सोस है, '' पुरुष ने कहा।
स्त्री चुप रही, उसने एक बार पुरुष को देखा।
कुछ पल चुप रहने के बाद पुरुष ने गहरी साँस ली। कहा, ''तुमने भी तो मुझे दहेज का लोभी कहा था।''
''गलत कहा था''.... पुरुष की ओऱ देखती हुई स्त्री बोली।
कुछ देर चुप रही फिर बोली, ''मैं कोई और आरोप लगाती लेकिन मैं नहीं...''
प्लास्टिक के कप में चाय आ गई।
स्त्री ने चाय उठाई, चाय ज़रा-सी छलकी। गर्म चाय स्त्री के हाथ पर गिरी।
स्सी... की आवाज़ निकली।
पुरुष के गले में उसी क्षण 'ओह' की आवाज़ निकली। स्त्री ने पुरुष को देखा। पुरुष स्त्री को देखे जा रहा था।
''तुम्हारा कमर दर्द कैसा है?''
''ऐसा ही है कभी वोवरॉन तो कभी काम्बीफ्लेम,'' स्त्री ने बात खत्म करनी चाही।
''तुम एक्सरसाइज भी तो नहीं करती।'' पुरुष ने कहा तो स्त्री फीकी हँसी हँस दी।
''तुम्हारे अस्थमा की क्या कंडीशन है... फिर अटैक तो नहीं पड़े????'' स्त्री ने पूछा।
''अस्थमा।डॉक्टर सूरी ने स्ट्रेन... मेंटल स्ट्रेस कम करने को कहा है, '' पुरुष ने जानकारी दी।
स्त्री ने पुरुष को देखा, देखती रही एकटक। जैसे पुरुष के चेहरे पर छपे तनाव को पढ़ रही हो।
''इनहेलर तो लेते रहते हो न?'' स्त्री ने पुरुष के चेहरे से नज़रें हटाईं और पूछा।
''हाँ, लेता रहता हूँ। आज लाना याद नहीं रहा, '' पुरुष ने कहा।
''तभी आज तुम्हारी साँस उखड़ी-उखड़ी-सी है, '' स्त्री ने हमदर्द लहजे में कहा।
''हाँ, कुछ इस वजह से और कुछ...'' पुरुष कहते-कहते रुक गया।
''कुछ... कुछ तनाव के कारण,'' स्त्री ने बात पूरी की।
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पुरुष कुछ सोचता रहा, फिर बोला, ''तुम्हें चार लाख रुपए देने हैं और छह हज़ार रुपए महीना भी।''
''हाँ... फिर?'' स्त्री ने पूछा।
''वसुंधरा में फ्लैट है... तुम्हें तो पता है। मैं उसे तुम्हारे नाम कर देता हूँ। चार लाख रुपए फिलहाल मेरे पास नहीं है।'' पुरुष ने अपने मन की बात कही।
''वसुंधरा वाले फ्लैट की कीमत तो बीस लाख रुपए होगी??? मुझे सिर्फ चार लाख रुपए चाहिए....'' स्त्री ने स्पष्ट किया।
''बिटिया बड़ी होगी... सौ खर्च होते हैं....'' पुरुष ने कहा।
''वो तो तुम छह हज़ार रुपए महीना मुझे देते रहोगे,'' स्त्री बोली।
''हाँ, ज़रूर दूँगा।''
''चार लाख अगर तुम्हारे पास नहीं है तो मुझे मत देना,'' स्त्री ने कहा।
उसके स्वर में पुराने संबंधों की गर्द थी।
पुरुष उसका चेहरा देखता रहा....
कितनी सह्रदय और कितनी सुंदर लग रही थी सामने बैठी स्त्री जो कभी उसकी पत्नी हुआ करती थी।
स्त्री पुरुष को देख रही थी और सोच रही थी, ''कितना सरल स्वभाव का है यह पुरुष, जो कभी उसका पति हुआ करता था। कितना प्यार करता था उससे... एक बार हरिद्वार में जब वह गंगा में स्नान कर रही थी तो उसके हाथ से जंजीर छूट गई। फिर पागलों की तरह वह बचाने चला आया था उसे। खुद तैरना नहीं आता था लाट साहब को और मुझे बचाने की कोशिशें करता रहा था... कितना अच्छा है... मैं ही खोट निकालती रही...''
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पुरुष एकटक स्त्री को देख रहा था और सोच रहा था, ''कितना ध्यान रखती थी, स्टीम के लिए पानी उबाल कर जग में डाल देती। उसके लिए हमेशा इनहेलर खरीद कर लाती, सेरेटाइड आक्यूहेलर बहुत महँगा था। हर महीने कंजूसी करती, पैसे बचाती, और आक्यूहेलर खरीद लाती। दूसरों की बीमारी की कौन परवाह करता है? ये करती थी परवाह! कभी जाहिर भी नहीं होने देती थी। कितनी संवेदना थी इसमें। मैं अपनी मर्दानगी के नशे में रहा। काश, जो मैं इसके जज़्बे को समझ पाता।''
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दोनों चुप थे, बेहद चुप।
दुनिया भर की आवाज़ों से मुक्त हो कर, खामोश।
दोनों भीगी आँखों से एक दूसरे को देखते रहे....
''मुझे एक बात कहनी है, '' उसकी आवाज़ में झिझक थी।
''कहो, '' स्त्री ने सजल आँखों से उसे देखा।
''डरता हूँ,'' पुरुष ने कहा।
''डरो मत। हो सकता है तुम्हारी बात मेरे मन की बात हो,'' स्त्री ने कहा।
''तुम बहुत याद आती रही,'' पुरुष बोला।
''तुम भी,'' स्त्री ने कहा।
''मैं तुम्हें अब भी प्रेम करता हूँ।''
''मैं भी.'' स्त्री ने कहा।
दोनों की आँखें कुछ ज़्यादा ही सजल हो गई थीं।
दोनों की आवाज़ जज़्बाती और चेहरे मासूम।
''क्या हम दोनों जीवन को नया मोड़ नहीं दे सकते?'' पुरुष ने पूछा।
''कौन-सा मोड़?''
''हम फिर से साथ-साथ रहने लगें... एक साथ... पति-पत्नी बन कर... बहुत अच्छे दोस्त बन कर।''
''ये पेपर?'' स्त्री ने पूछा।
''फाड़ देते हैं।'' पुरुष ने कहा औऱ अपने हाथ से तलाक के काग़ज़ात फाड़ दिए। फिर स्त्री ने भी वही किया। दोनों उठ खड़े हुए। एक दूसरे के हाथ में हाथ डाल कर मुस्कराए।
दोनों पक्षों के रिश्तेदार हैरान-परेशान थे।
दोनों पति-पत्नी हाथ में हाथ डाले घर की तरफ चले गए।
घर जो सिर्फ और सिर्फ पति-पत्नी का था।